शनिवार, 25 अप्रैल 2015

खजाना या गड़ा धन मिलने से पहले कुछ ऐसा होने लगता है


खजाना हर किसी व्यक्ति को नहीं मिल सकता। जिसकी किस्मत में अचानक अपार धन प्राप्त करने के योग हैं वहीं गुप्त खजाना प्राप्त कर सकता है। अचानक धन लाभ होने से पहले आपको किस्मत के इशारे मिलते हैं।
ये इशारे सपने में और खुली आखों से या आसपास होने वाली छोटी-छोटी घटनाओं के रूप में महसुस होते हैं। धन लाभ के लिए कई तरह के संकेत होते हैं। रावण संहिता के अनुसार सपने, शगुन और स्वर विज्ञान उनमें से एक है।
खास तौर से किन लोगों को महसुस होता है गड़ा धन-
सपने में कुआं देखना भी गड़ा खजाना मिलने का एक संकेत हैं। अगर जमीन में छुपा खजाना आपको मिलने वाला है तो अक्सर आपको सपने में कोई गड्डा, छोटा कुआं या खाई दिखने लगेगी। जमीन में छुपा खजाना अक्सर साफ दिल वाले लोगों को ही मिलता है या उन लोगों को मिलता है जिनके मन में कोई छल, कपट नहीं होता।
कुछ लोगों को पितृ देवता का इष्ट होता है ऐसे लोगों को सपने में अक्सर सफेद सांप या दीपक जलते हुए दिखाई देते हैं और उन लोगों को गड़ा धन या खजाना अचानक मिल जाता है या महसुस होता है।
कुछ खास लोग होते हैं जिन्हे गड़ा धन या खजाना महसुस हो जाता है, ये वो लोग होते हैं जो पैर की तरफ से जन्म लेते हैं यानी जिनके जन्म के समय पहले सिर बाहर न आते हुए पैर बाहर आते हैं।
कैसे निकालें खजाना या गड़ा धन :
गड़ा धन निकानले के लिए सबसे पहले निश्चित करें कि किस जगह धन है। उस जगह को पहले पवित्र करें और उस स्थान की पूजा करें। पुराणों के अनुसार ऐसी जगहों पर विशेष शक्तियों का पहरा होता है। गड़े धन या खजाने की रक्षा नाग लोक करता है। नाग योनी पितृ देवताओं की होती है। पितृ ही गड़े धन की रक्षा नाग के रूप में करते हैं। इस खजानें को बिना पितृ की आज्ञा से नहीं निकालना चाहिए। पहले पितृ देवताओं को खुश करना चाहिए। इसके लिए उनके निमित्त हवन और दान कर के धन
सही उपयोग का संकल्प लेना चाहिए। गड़े धन का बड़ा हिस्सा धर्म-कर्म, दान और पितृ पूजा में लगाने का संकल्प लेना चाहिए।
शुभ तिथि और वार को या किसी खास पर्व, ग्रहों के शुभ संयोग या अपनी कुंडली के अनुसार शुभ दिन निकलवाकर उस दिन गड़ा धन निकालना चाहिए। धन निकालन के पहले होने वाली पूजा भी शुभ तिथि या पितृ की तिथि यानी पंचमी, अमावस्या या पूर्णिमा पर पूजा पाठ करवाना चाहिए। पूजा करवाने के बाद पितृ आपको सपने में दर्शन देते हैं अगर सपने में पितृ देव आपको धन निकालने की आज्ञा दें तो ही धन निकालना चाहिए ।
कहां मिलता है खजाना:
रावण संहिता और वाराह संहिता के अनुसार गुप्त खजाना कहां छिपा होता है? यह मालूम करने के कई उपाय बताए गए हैं। जिस भी स्थान पर अपार धन, सोना-चांदी, हीरे-मोती छिपे या दबे होते हैं वहां सफेद नाग या कोई बहुत पुराना नाग अवश्य दिखाई देता है। इसके अलावा कहीं-कहीं नागों के झूंड भी ऐसे गुप्त खजानों की रक्षा करते हैं। ऐसे नागों का दिखाई देना ही इस बात की ओर इशारा करता है कि उस क्षेत्र में कहीं खजाना दबा हो सकता है।
कईं साल पुराने घरों में खजाना छुपा हो सकता है। ऐसे घरों में जो पितृ के समय से ज्यों के त्यों पड़ें हों या जिन घरो में सालों से कोई खुदाई या नव निर्माण नहीं किया गया हो ऐसी जगहों पर खजाना या गड़ा धन होता है।
पूराने किलें जहां कभी राजा-महाराजा रहा करते थे। खंडहरों में भी खजाना छुपा होता है क्योंकि वहां पर शक्तियों को परेशान करने वाला कोई नहीं होता और इंसानो से दुर इनकी अपनी अलग दुनिया होती है।
जंगलों में भी ऐसे खजाने मिलते हैं क्योंकि पहले के लोग ज्यादातर समय युद्ध में और जंगलों में बीताते थे। धन की रक्षा के लिए वो उसे जमीन में छुपा दिया करते थें और मौत के बाद सांप के रूप में वो उसी जगह बस जाते हैं और धन की रक्ष करते हैं।
कैसे सपने बताते हैं खजाने के बारे में
सांप या नाग :
- अगर आपको सपने में सफेद सांप दिखाई दे तों समझिए आपको अचानक धन लाभ होने वाला है। नाग पितृ देवता के रूप में विचरण करते हैं और योग्य व्यक्ति को सपने में आकर दर्शन देते हैं।
- सपने में सफेद नाग-नागिन का जोड़ा जिस घर में या जिस स्थान पर दिखें उस जगह पर आपके पूर्वजों द्वारा रखा गया गड़ा धन होता है।
फूल-
- अगर सपने में फूल दिखाई दे तो आपको अचानक धन लाभ, खजाना या कहीं से गड़ा धन मिलने का संकेत होता है।
- रावण संहिता के अनुसार आपको सपने में दिखने वाला फूल अगर कमल हो तो ये अचानक कहीं से आपको बड़ा फायदा होने का संकेत है।
- अगर आप सपने में में इन्द्र धनुष के साथ कमल को देखते हैं यानी इन्द्र धनुष दिखे और कमल का फूल आपके हाथ हो तो आने वाले 45 दिनों में ही आपको इस सपने का फल देखने को मिल जाता है। अगर आप सपने में कमल के पत्ते पर भोजन करते हुए खुद को देखते हैं तो आपको आने वाले कुछ ही दिनों में छुपा हुआ धन लाभ होने वाला है।
आभूषण और मंगल चिन्ह
अगर सपने में कलश, शंख और सोने के गहने दिखे तो आपको अचानक धन लाभ होगा। रावण संहिता के अनुसार कलश, शंख और गहने आदि मंगल चीजे सपने तभी आती है जब आप पर लक्ष्मी जी खुश होती है।
पौराणिक ग्रंथों और संहिताओं के अनुसार कुछ सपने ऐसे होते हैं जो जैसे के तैसे सच हो जाते हैं।
- अगर आपको सपने में कोई कन्या जो खुद सोने के आभूषण पहने हुए हो और वो आपको सोने का सिक्का दे तो आने वाले कुछ ही दिनों में आपको इस सपने का फल मिल जाएगा।
- कलश सिर पर रखे हुए अगर कोई कन्या सपने में आपको सिक्का दे या किसी दिशा में इशारा करें तो उस दिशा में आपको गड़ा धन मिलेगा।
हरे पेड़ या पीपल-
- अगर आप सपने में पिपल पर कच्च दुध चढ़ा रहे हैं तो आपको पुर्वजों का धन मिलेगा अगर आपके निवार स्थान वाला पिपल हो तो आपको वहीं धन लाभ होगा लेकिन पिपल नहीं कटवाना चाहिए इससे परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।
- अगर आपको सपने में पिपल का पेड़ या उस पेड़ पर कोई सफेद कपड़ें में बैठकर आपको किसी दिशा की तरफ इशारा करे तो आपको वहां से धन लाभ होगा।
पानी-
जिस घर, किले या खंडहर में धन छुपा होता है सपने में उसी जगह पर पानी भरा हुआ दिखाई देता है।
उस पानी में खुद को बहते हुए देखना या उस जगह सिर्फ पानी को बहते देखना खजाना या गड़ा धन मिलने का संकेत हैं।
सपने में जिस जगह पर पानी में कमल, शंख और कलश बहते दिखाई दें तो समझें आपको उस जगह से गड़ा धन प्राप्त होने वाला है।
पूराने मंदिर-
अगर आपको खजाना मिलने वाला है तो आपको ऐसे पूराने मंदिरो के सपने आएंगे जो
कई साल पूराने हों। ऐसे मन्दिरों में आपको घंटीयां बजती हुई सुनाई देंगी। ऐसे मन्दिर शिव या नाग देवता के हों तो आपको धन लाभ होने के योग बनते हैं।
- आपको पूरानी भगवान की मुर्तियां या नाग की मुर्तियां जब दिखने लगे तो समझना चाहिए कि धन लाभ होने वाला है।
- ऐसे सपने खास तौर पर पंचमी, अमावस्या या पूर्णिमा को दिखाई दे तो समझना चाहिए सपने का फल जल्दी ही मिलने वाला है।
सफेद हाथी-
अगर आपको सपने में ऐरावत या सफेद हाथी का दर्शन हो तो आपको अचानक धन लाभ होगा। सफेद हाथी आपको जिस जगह दिखे उस जगह ही गड़ा धन होना जानना चाहिए।
सपने में हाथी दांत से बनी चिजें धारण करना भी शुभ स्वपन होता है। ऐसा सपना तभी आता है जब आपको गड़ा धन या अचानक कहीं से धन लाभ के योग होते हैं।
मल और गाली गलौज युक्त झगड़ा-
अगर सपने में आप मल देखें या खुद को शरीर पर मल लगाते देखें तो आपको अचानक धन लाभ होगा।
सपने में खुद को ऐसी जगह देखना जहां मल ही मल हो, ये भी धन लाभ का सपना है।
अगर आप सपने में खुद को गाली-गलौज युक्त लड़ाई में देख रहे हैं, लेकिन सुबह तक गाली-गलौज आपको याद न रहें तो ये भी आपका रूका पैसा आने का संकेत होता है।
नेवला-
रावण संहिता के अनुसार नेवला धन संकेत देने वाला जीव है। अगर आप किसी सुनसान जगह हों या ऐसे जंगल में हो जहां नेवेले अधिक हो तो आपको उस जगह से गड़ा धन जरूर मिलेगा।
अगर किसी पूराने मंदिर, खंडहर या पुराने घर में हो और वहां पर नेवला आपके आसपास रहे तो वहां आस-पास धन गड़ा हुआ समझना चाहिए।
उल्लु-
पक्षी तंत्र के अनुसार उल्लू धन के संकेत देने वाला होता है। जिन जगहों पर गड़ा धन या खजाना होता है। वहां उल्लूूू पाए जाते हैं। तंत्र शास्त्रों में उल्लू को धन की रक्षा करने वाला माना जाता है। उल्लू जिस घर या मंदिर में रहने लग जाए तो समझे उस जगह गड़ा धन या खजाना होगा और जहां उल्लू रहने लग जाते हैं ऐसी जगह जल्दी ही सुनसान हो जाती है।
जिस भी साधक की जो भी समस्या है वह फोन करके पूछे हम कमेंट्स या मैसेज का जवाब नहीं देते कुछ लोग उलटे सीधे कमेन्ट लिख कर लोगों को भ्रमित करते हैं अत: ध्यान रखें कि हम कोई शुल्क नहीं लेते और हमारे द्वारा लिखे जाने वाले उपाय अत्यंत प्रचंड रावण संहिता के उपाय हैं जो हमारे और हमारी १२ पीढ़ियों के द्वारा अनुभूत हैं

सोमवार, 16 जून 2014

भाग्योदय लक्ष्मी साधना ॰

अभी तक आपने बहोत सी लक्ष्मी साधना ये की हुयी है परंतु परिणाम तो कही ना कही उतनी ही मिली है जितनी आपकी आमदनी है या फिर बढ़ोतरी मिली है या थोड़ी बहुत कही से अप्रत्यक्ष लाभ हुयी हो। अगर यही स्थिति रही लक्ष्मी जी की कृपा की तो आनेवाली समय मे ये महेंगाइ नाम की ड़ायन हम साभिकों खा जायेगी॰ सभी सिद्धों ने एक बात कही है की लक्ष्मी जी चंचला है और येसे लक्ष्मी की कृपा से जीवन जीने की कोई कला प्राप्ति नहीं हो सकती है,जब स्थिर लक्ष्मी जी की कृपा हो जायेगी तो सम्पूर्ण जीवन मे अंधकार दूर होकर जीवन मे गतिमान प्रकाश होगी मतलब सारी सुख और समृद्धि की प्राप्ति होगी॰ येसे  जीवन की प्राप्ति सारे दुखो को समाप्त कर देती है।
भाग्योदय लक्ष्मी साधना अपने आप मे तीव्र गति से भाग्योदय प्राप्ति की अनुभूतित साधना है,यह प्रयोग कार्तिक माह की पंचमी तिथि से करनी है,इस दिवस को पांडव पंचमी,सौभाग्य पंचमी और भाग्योदय पंचमी भी कहेते है और यह प्रयोग अचूक है,इस प्रयोग को करनेसे घर की सारी धन की प्रति आनेवाली चिंताये समाप्त हो जाती है॰आश्चर्यजनक रूप से व्यापार वृद्धि ,आर्थिक उन्नति ,प्रमोशन ,भाग्योदय और लाभ प्राप्त होने लगती है॰ वास्तव मे ही यह प्रयोग आज की महेंगाइ मे कल्पवृक्ष की समान है ।

साधना विधि:-
           यह साधना  तीन दीनों मे सम्पन्न करनी है,साधक रविवार की सुबह ब्रम्ह मुहूर्त मे स्नान करके पीले वस्त्र धारण करके साधना मे बैठ जाये,सामने किसी बाजोठ पे पीले रंग की वस्त्र बिछाये और महालक्ष्मी जी की कोई दिव्य-भव्य चित्र स्थापित करे,अब सामने भोजपत्र पे ऊपर दिये हुये भाग्योदय लक्ष्मी यन्त्र की निर्माण अष्ठगंध से अनार की कलाम से कीजिये, यह यन्त्र अपनी दोनों हाथो मे पकड़कर लक्ष्मी-चैतन्य मंत्र 108 बार बोलिये और यन्त्र किसी स्टील की बड़ी सी प्लेट मे स्थापित कीजिये,अब अनार की कलम से यंत्र की आजू-बाजू मे 108 बार ‘श्रीं’ अक्षर लिखनी है,अब इसी ‘श्रीं’ अक्षर की ऊपर हल्दी+केसर से रंगी हुयी चावल स्थापित करनी है ताकि कोई भी अक्षर हम देख ना सके सिर्फ यन्त्र ही दिखनी चाहिये,अब यंत्र की मानसिक पद्धति से पूजन कीजिये,और सदगुरुजी से प्रार्थना कीजिये की इस साधना मे आपको पूर्ण सफलता ही प्राप्त हो,अब यन्त्र पे एक गोमती चक्र स्थापित कीजिये।
यह पूर्ण विधि-विधान सिर्फ एक ही दिन करनी है,और तीसरे दिन इस गोमती चक्र को चाँदी की लॉकेट मे बनवाकर लाल धागे मे एक वर्ष तक गले मे धारण करनी है ॰ और जो चावल आपने अक्षर पर चढ़ाये हुये है इन्हे किसी भी रंग की पोटली मे बांधकर नदी या सरोवर पर ले जायिये ॰ नदी की पानी मे उतरकर यह चावल आपको अपने सिर पे थोड़े-थोड़े करते हुये छिड़कने है परंतु चावल पनि मे ही गिरने चाहिये इस बात की विशेष ध्यान रखनी है  ॰






लक्ष्मी चैतन्य मंत्र

!! ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं चैतन्यम कुरु जाग्रय जाग्रय श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ फट !!


भाग्योदय लक्ष्मी साबर मंत्र:-


ॐ लिछमी कील महालछमी किलूं किलूं जगत संसार न किले तो वीर विक्रमादित्य की आण ! ठं ठं ठं



इस मंत्र की 3 माला जाप 3 दिन तक करनी है,जब साधना पूर्ण हो जाए तब भोज़पत्र पे अंकित यंत्र को साधना कक्ष मे या पूजा स्थान मे स्थापित कर दीजिये और यन्त्र के नीत्य दर्शन कीजिये.......

दुर्गा उपासना

जीवन की व्याख्या ही अपने आप मे एक कठिन बात है,साथ मे जीवन की सारी इच्छाये ही हमे पाप-पुण्य की और अग्रेसर करती है॰ कही येसी भी बाते है जिन्हे सिर्फ एक नाम दी जाती है जैसे ‘तंत्र या तन्त्रोक्त साधना’ पर क्या किसिने ये जान्ने की कोशिश की है की इस साधना की वास्तविकता क्या है ? शायद समय ही नहीं है किसिके पास,इसिलिये सारी साधनात्मक गलतिया हमारे ही नसीब मे लिखी गयी है,क्या मै ये पूछ सकती हु की साधक अपने पतन और प्रगति मे किस गति से चल रहे है। चलो जानेदो गलतिया भूलानेसे ही आगे प्रगति होगी। हमारे सदगुरुजी ने एक बात हमेशा कही है ‘‘माँ जगदंबा की इच्छा रही,तो हम इस साधना विषय पर आगे भी बात करेगे” और सदगुरुजी की इस बात से तो एक बात हमारे समज मे तो आहि जाती है की “ दुर्गा जी की उपासना ” कितनी महत्वपूर्ण है,मै तो सिर्फ इतना ही कहेना चाहती हु की चाहे दुनिया की लाखो साधनाये आप कर लीजिये परंतु अंतता आना है आपको माँ भगवती जी की शरण मे और सदगुरुजी की शरण मे। अगर आप ये बात जानते है तो फिर येसी भटकन क्यू चल रही है मस्तिष्य मे की नवरात्रि आयेगी तभी हम दुर्गाजी की साधना सम्पन्न करेगे , कोई contract sign की है क्या हमने माँ के साथ ? जब येसी कोई बात ना हो तो आज से ही दुर्गा उपासना आवश्यक है , हमने जन्म लेते समय पंचांग नहीं देखि थी और नहीं मृत्यु की समय देखने वाले है क्यूकी जीवन-मृत्यु कोई कहानी नहीं एक पूर्ण सत्य है तो ये बात भी समजनी आवश्यक है की दुर्गा उपासना भी एक पूर्ण सत्य है कोई भी कहानी नहीं। दुर्गा साधना मे मेरी अनुभूतिया आज तक तो 100% ही है आगे माँ जगदंबा की इच्छा । कोई भी भगवती साधक/साधिका विश्व-कल्याण की ही बात करेगे,स्वयं के कल्याण की नहीं , अगर उन्हे साधनात्मक अनुभूतिया हो तो । इस साधना मे कई प्रकार की अनुभूतिया मिलती ही है,संसार मे येसी कोई इच्छा ही बाकी नहीं रहेती है ज्यो हमे नवार्ण मंत्र जाप से ना मिले,नवार्ण साधना साभिकी प्रिय साधना है चाहे फिर वह शिव,विष्णु,ब्रम्ह,इन्द्र,सन्यासी,गृहस्थ या अन्य कोई देवी देवताये ही क्यू न हो। जब यह इतनी प्रिय साधना है तो बाकी साधनात्मक चिंतन तो नहीं होनी चाहिये, आपकी ध्येय आपको ही सोचनी है ताकि लक्ष्य प्राप्ति मे पूर्णता मिले ,मै तो ग्यारंन्टी और चुनौती के साथ बोल सकती हु की मनोकामना पूर्ति हेतु इस्से बड़ी कोई साधना इस पूरे संसार मे ही नहीं है , यह साधना हर मनोकामना पूर्ति की लिये सभी लोको मे प्रचलित साधना है , आज मै जहा तक भी पहोचि हु इस बात की सारी श्रेय मै गुरूसाधना और नवार्ण को ही देती हु अन्य साधना ओ को नहीं,मेरी सारी इच्छाये इन दो ही साधना ओ से मैंने पूर्ण होते हुये देखि है और हुयी ही है,जब येसी साधनाये आपके पास हो और फिर भी आप समस्याओसे ग्रसित है तो इस बात से मै बहोत ज्यादा दुखी हु ……………
इसी विषय पर अब तो आगे भी बात चलेगी,अब हम साधनात्मक बात करते है।
साधना सामग्री:- नवार्ण यंत्र , कार्य सिद्धि यंत्र , स्फटिक माला ,जगदंबा जी का भव्य चित्र , लाल वस्त्र , लाल आसन ।
नोट:ये मत सोचिये की आपके पास की सामग्री चैतन्य है या नहीं है,आपको तो सिर्फ यही बात सोचनी है की कही से भी यह सामग्री शीघ्र ही आपको प्राप्त हो जाये,सामग्री को चैतन्य करने की क्रिया की ज़िम्मेदारी मै लेती हु।
साधना विधि :-

ॐ नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नम :।
नम: प्रकृत्यै भद्रायै नियता: प्रणता: स्म ताम ॥
यह मंत्र 11 बार बोलनी है ताकि साधनात्मक वातावरण चैतन्य बने,
शुद्धिकरण:-(एक-एक मंत्र उच्चारण की साथ जल पीनी है)
हाथ मे जल लेकर मंत्र बोलिए,
ॐ ऐं आत्मतत्वं शोधयामी नम: स्वाहा ॥
ॐ ह्रीं विद्यातत्वं शोधयामी नम: स्वाहा ॥
ॐ क्लीं शिवतत्वं शोधयामी नम: स्वाहा ॥
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं सर्वतत्वं शोधयामी नम: स्वाहा ॥ (बोलते हुये हाथ धो लीजिये)

विनियोग:-

ॐ अस्य श्रीनवार्णमंत्रस्य ब्रम्हाविष्णुरुद्रा ऋषय:गायत्र्युष्णिगनुष्टुभश्छंन्दांसी , श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वत्यो देवता: , ऐं बीजम , ह्रीं शक्ति: , क्लीं कीलकम श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वत्यो प्रीत्यर्थे जपे विनियोग: ॥


विलोम बीज न्यास:-

ॐ च्चै नम: गूदे ।
ॐ विं नम: मुखे ।
ॐ यै नम: वाम नासा पूटे ।
ॐ डां नम: दक्ष नासा पुटे ।
ॐ मुं नम: वाम कर्णे ।
ॐ चां नम: दक्ष कर्णे ।
ॐ क्लीं नम: वाम नेत्रे ।
ॐ ह्रीं नम: दक्ष नेत्रे ।
ॐ ऐं ह्रीं नम: शिखायाम ॥
(विलोम न्यास से सर्व दुखोकी नाश होती है,संबन्धित मंत्र उच्चारण की साथ दहीने हाथ की उँगलियो से संबन्धित स्थान पे स्पर्श कीजिये)

ब्रम्हारूपन्यास:-

ॐ ब्रम्हा सनातन: पादादी नाभि पर्यन्तं मां पातु ॥
ॐ जनार्दन: नाभेर्विशुद्धी पर्यन्तं नित्यं मां पातु ॥
ॐ रुद्र स्त्रीलोचन: विशुद्धेर्वम्हरंध्रातं मां पातु ॥
ॐ हं स: पादद्वयं मे पातु ॥
ॐ वैनतेय: कर इयं मे पातु ॥
ॐ वृषभश्चक्षुषी मे पातु ॥
ॐ गजानन: सर्वाड्गानी मे पातु ॥
ॐ सर्वानंन्द मयोहरी: परपरौ देहभागौ मे पातु ॥
( ब्रम्हारूपन्यास से सभी मनोकामनाये पूर्ण होती है, संबन्धित मंत्र उच्चारण की साथ दोनों हाथो की उँगलियो से संबन्धित स्थान पे स्पर्श कीजिये )




ध्यान:-

खड्गमं चक्रगदेशुषुचापपरिघात्र्छुलं भूशुण्डीम शिर:
शड्ख संदधतीं करैस्त्रीनयना सर्वाड्ग भूषावृताम ।
नीलाश्मद्दुतीमास्यपाददशकां सेवे महाकालीकां
यामस्तौत्स्वपिते हरौ कमलजो हन्तुं मधु कैटभम ॥
अब हमे जितनी भी जानकारी माँ की प्रति है उसी हिसाब से उनकी नित्य ध्यान और स्तुति करनी है,


निम्न मंत्र 21 बार बोलनी है,

ॐ ह्रीं सर्वबाधा प्रशमनं ,त्रैलोकस्याखिलेश्वरी ।
एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरि , विनाशनम ॥ ह्रीं ॐ ॥ फट स्वाहा: ॥


माला पूजन:-जाप आरंभ करनेसे पूर्व ही इस मंत्र से मालाकी पुजा कीजिये,इस विधि से आपकी माला भी चैतन्य हो जाती है ॰

“ऐं ह्रीं अक्षमालिकायै नंम:’’

ॐ मां माले महामाये सर्वशक्तिस्वरूपिनी ।
चतुर्वर्गस्त्वयि न्यस्तस्तस्मान्मे सिद्धिदा भव ॥
ॐ अविघ्नं कुरु माले त्वं गृहनामी दक्षिणे करे ।
जपकाले च सिद्ध्यर्थ प्रसीद मम सिद्धये ॥

ॐ अक्षमालाधिपतये सुसिद्धिं देही देही सर्वमन्त्रार्थसाधिनी साधय साधय सर्वसिद्धिं परिकल्पय परिकल्पय मे स्वाहा ।
नवार्ण मंत्र :-

                         !! ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे !!
               

जप पूरा करके उसे भगवतीजी की चरणोमे समर्पित करते हुए कहे


गुह्यातिगुह्यगोप्त्री त्वं गृहाणास्मत्कृतं जपम ।
सिद्धिर्भवतू मे देवी त्वत्प्रसादान्महेश्वरी ॥


नवार्ण मंत्र की सिद्धि 9 दिनो मे 1,25,000 मंत्र जाप से होती है,परंतु आप येसे नहीं कर सकते है तो रोज 3,5,7,11,21………….इत्यादि माला मंत्र जाप भी हम कर सकते है,इस विधि से सारी इच्छाये पूर्ण होती है,सारी दुख समाप्त होती है और धन की वसूली भी सहज ही हो जाती है। हमे शास्त्र की हिसाब से यह सोलह प्रकार की न्यास देखने मिलती है जैसे ऋष्यादी ,कर ,हृदयादी ,अक्षर ,दिड्ग ,सारस्वत ,प्रथम मातृका ,द्वितीय मातृका ,तृतीय मातृका ,षडदेवी ,ब्रम्हरूप ,बीज मंत्र ,विलोम बीज ,षड ,सप्तशती ,शक्ति जाग्रण न्यास और बाकीकी 8 न्यास गुप्त न्यास नाम से जानी जाती है,इन सारी न्यासो की अपनी एक अलग ही अनुभूतिया होती है,उदाहरण की लिये शक्ति जाग्रण न्यास से माँ सुष्म रूप से साधकोके सामने शीघ्र ही आ जाती है और मंत्र जाप की प्रभाव से प्रत्यक्ष होती है और जब माँ चाहे किसिभी रूप मे क्यू न आये हमारी कल्याण तो निच्छित है।
यहा से आगे भी एक और साधना हमे सदगुरुजी की असीम कृपा से सदगुरुजी की श्रीमुख से प्राप्त हुयी है,यह साधना बहुत ही अद्वितीय है। जिसे हमे आगे की साधनाओमे करनी है........
( नोट:-कृपया अनुष्ठान की रूप मे साधना करते समय कलश स्थापना आवश्यक मानी जाती है , इस बात की ध्यान रखिये )

द्वादश काली साधन

यह सारी की सारी ब्रम्हान्ड मात्र एक अपार सक्रिय चेतना की प्रवाह है अर्थात इस अपार शक्ति की द्वादश काली की प्रतिक रूप मे तीस अंशो मे तथा इन्ही तीस अंशो को माह की रूप मे दर्शायी गयी है. इन्ही तीस अंशो की प्रथम प्रतिप्रदा से लेकर पूर्णमासी एवं फिर पूर्णमासी के बाद प्रतिप्रदा से अमावस्या तक तिथियो की फलस्वरूप तीस अंश की प्रत्येक अंश मे विभक्त की कियी गयी है। इस प्रकार हमारी पृथ्वी की यही तीस अंश मास की फलस्वरूप अंश रेखा कहलाती है। यही द्वादश काली प्रथम सृष्टि + स्थिति एवं संहार करती रहेती है।
अर्थात
प्रथम स्थिति मे  (स्थिति+सृष्टि) ,(सृष्टि+स्थिति) एवं (सृष्टि+संहार)…………….
द्वितीय स्थिति मे (सृष्टि+सृष्टि) ,(स्थिति+स्थिति) एवं (स्थिति+संहार)…………
तृतीय स्थिति मे  (संहार+संहार) ,(संहार+सृष्टि) एवं (संहार+स्थिती) की रूप मे कालचक्र का बनाना एवं बिगड़ना यह क्रिया निरंतर चलती रहेती ही है। इस प्रकार से ब्रम्हान्ड व्यापक शक्ति की स्वयंभू स्वरूप है और इसी स्वरूप की चारों ओर आठ भैरव रूपी शक्तीयो की निवास है।
भैरव अर्थात (भ) से भरण(सृष्टि) ,(र) से रमण(स्थिति) तथा (व) से वरण(संहार)। यही अष्ट भैरव अष्ट दिशाओ को भी दर्शाते है। इन्हि की बीच मे पूर्ण राज भैरव है,क्योकि इसी पूर्ण राज भैरव अर्थात सूर्य की पृथ्वी (माता) भी अपनी धुरी पर पश्चिम से पूर्व की परिक्रमा करती रहेती है। यहा पूर्ण राज भैरवजी पर मै ज्यादा नहीं लिखना चाहती हु ,परंतु समय आने पर इनकी साधना अवश्य दुगी।
साधना:- यह बात तो आपको समज़ मे आ ही गयी होगी की द्वादश काली साधना कितनी महत्वपूर्ण साधना है । इस साधना से बहोत सारी लाभों की मान्यताये कई तंत्र शास्त्र मे बताई गयी है।
ज्यो साधक/साधिका अपनी पूर्ण जीवन काल मे द्वादश काली साधना सम्पन्न करते है वह साधक ब्रम्हान्ड भेदन क्रिया के अधिकारी होते है और सारे दृष्ट ग्रह उनके सामने हाथ बांधे हुये खड़े होते ही है..................
सामग्री:- महाकाली चित्र,काली हकीक माला,एक सुपारी,काली धोती,काला आसन,एक हरे रंग की नींबू ।


विनियोग :-

    ॐ अस्य श्री द्वादश काली मंत्रस्य भैरव ऋषी:,उष्णीक छंन्द:,कालिका देवता , क्रीं बीजम ,हुं शक्ती: ,क्रीं किलकं मम अभीष्ट सिध्द्यर्थे जपे विनियोग:।

देवी की स्तुति कीजिये परंतु अपनी भावना की आधार पर,ज्यो भी आपकी दिल से निकले वह स्तुति एवं ध्यान कीजिये ।

अब भगवान महाकालभैरव जी को कोई एक पुष्प मंत्र बोलते हुये समर्पित कीजिये।

ॐ हूं स्फ़्रौं यं रं लं वं क्रौं महकालभैरव सर्व विघ्नन्नाशय नाशाय ह्रीं श्रीं फट् स्वाहा


अब निम्न मंत्र की 18 मालाये नवरात्रि की प्रतिप्रदा से अष्टमी तक करनी है और नवमी को किसी अग्नि पात्र मे अग्नि प्रज्वलित कीजिये साथ मे काले तिल और काली मिर्च की 151 आहुती दीजिये।यह विधान सम्पन्न करते ही आपकी साधना पूर्ण मनी जायेगी।
                       मंत्र :
      । । ॐ क्रीं हुं क्रीं द्वादश कालीके क्रीं हुं क्रीं फट् । ।


निम्न मंत्र बोलते हुये देवी को प्रणाम कीजिये और कोई भी लाल रंग की पुष्प समर्पित कीजिये।

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्रीं हुं ह्रीं श्री सर्वार्थदायक ब्रम्हान्ड स्वामिनी नमस्ते नमस्ते स्वाहा
अब देवी को नींबू की बली चढानी है,इसीलिए निम्न मंत्र बोलते हुये ज़ोर से नींबू पे प्रहार कीजिये और देवी की सामने उसे फोड़ दीजिये।

ॐ क्रीं ह्रीं क्रीं फट बलीं दद्यात स्वाहा

साधना काल मे शुद्धता की पालन कीजिये,और नवरात्रि की पावन पर्व इस साधना की लिये यह तीव्रतम समय है क्यूकी यह नवरात्रि मंगलवार से प्रारम्भ हो रही है। और यह साधना समाप्त होते ही रात्री मे माँ स्वप्न मे दर्शन देती है और हमसे कोई भी इच्छा प्रगट करने की आज्ञा देती है,हम माँ से ज्यो भी वरदान मांगेंगे वह माँ तथास्तु कहेते हुये प्रदान कर देती ही है।अब जब माँ ही सब कुछ देने की लिये तयार है तो मै साधना की बारे मे और क्या लाभ लिख सकता हु ।

कामकाली साधना

सारी ब्रम्हान्ड मे ज्यो कुछ देखे वह माँ आपकी ही माया है ।
आपही हो माँ ज्यो मेरी हो और सिर्फ मेरी ही माँ हो । ।

कामकाली जी की स्तुति नहीं कर सकती हु क्यूकी माँ की गुणगान की लिए शब्द ही छोटे पड रहे है,फिर भी एक बार कोशिश करके देखती हु...................
जिस समय दिन-रात,पृथ्वी-आकाश,हवा-पानी,विवेक-बुद्धि,हृदय की स्पंदने कुछ भी न था उस समय आदिशक्ति पराम्बा जी की रूप मे सिर्फ आप और सिर्फ आप ही थी। आप ने मेरी प्यारी माँ ब्रम्हा,विष्णु,महेश,और इस त्रिभुवन को भी जन्म दिया है। हे माँ आप चौदह भुवनो की अधिष्ट्राती देवी हो,सभी देवी देवताये आपकी साधना करके ही सिद्ध और चैतन्य बने हुये है और आपकी ही कृपा से सभी देवी-देवताओको सिद्धीया प्राप्त हुयी है।
‘’कामकला मे काम बीज ‘क्लीं’ है,क्लींकार सदाशिव काम है, ’क’ आकाश तत्व है, ‘ल’ पृथ्वी तत्व है, पाताल से लेकर आकाश तक सारी आपकी ही कला है। जब तक माँ आपकी शक्ति सभी देवी देवताओ के साथ कार्य कर रही है तब तक ही इन सबकी वास्तविकता है, इसी कारण रात्री की मध्यकाल मे।महानिशा की शुभ समय मे आपकी उपासना सर्वश्रेष्ठ है,
नवरात्रि नजदीक आ रही है इसीलिये मै ज्यादा कुछ नहीं लिख पाउगी परंतु नवरात्रि की बाद और कुछ लिखना चाहुगी।

साधना विधि :-

सर्वप्रथम गुरुपूजन कीजिये और गुरुमंत्र की 5 माला जाप कीजिये। फिर भैरव मंत्र की 1 माला जाप करनी है ।

यह मंत्र माँ की सेवा मे ज्यो भैरव जी है,उनकी है।

                      ॥ फ्रें भैरवाय फ्रें फट ॥

विनियोग:-

        ॐ अस्य श्री वितहव्य ऋषी जगती छन्द कामकालीदेवता नाराच द्रां बीजं कुन्त क्रीं शक्ति सृष्टि किलकं श्रीकामकालीका सिद्धि प्रीत्यर्थे जपे विनियोग:।

ध्यान:-

ध्यानमस्या: प्रवक्ष्यामी कुरू चीत्तयेकतानाम ।
उद्ददघनाघना श्लीष्यज्जवाकुसुमसन्नीभाम । ।

करन्यास:-

क्लीं का अंगुष्टाभ्यां नम:।
क्रीं म तर्जनिभ्यां नम:।
हुं क मध्यमाभ्यां नम:।
क्रों ला अनामिकाभ्यां नम:।
स्फ्रें का कनीष्ठीकाभ्यां नम:।
काम कलाकाली ली करतल करपृष्ठाभ्यां नम:।

मंत्र :-

             । ।  क्लीं स्फ्रें स्फ्रें क्लीं फट । ।


साधना मे आप काले वस्त्र ,काला आसन ,काली हकीक या रुद्राक्ष की माला,महाकाली जी का चित्र एवं कोई भी शिवलिंग । दिशा पूर्व या दक्षिण । समय 11:36 से 01:36 तक।संकल्प लेना आवश्यक है। इस साधना मे 11 मालाये नीत्य 9 दिन तक करनी है .

साधना समाप्ती की बाद रोज शिव जी का अभिषेक 108 मंत्र बोलते हुये कीजिये

                    ॥ क्लीं शिवाय क्लीं फट ॥

अब प्रसाद की स्वरूप मे भोग लगा दीजिये। और कोई एक सफ़ेद पुष्प चढाते हुये फिर से एक बार अपनी मनोकामना बोल दीजिये।
                 ॐ शांति शांति बोलते हुये अब अपनी ऊपर जल छिडके।

यह पूर्ण क्रिया 9 दिन तक करनी है तभी जाकर साधना पूर्ण मनी जायेगी,और आपकी इच्छाये भी पूर्ण हो जायेगी.........

तान्त्रोक्त गोरखक्षनाथ प्रत्यक्षीकरण साधना॰

श्रीमदभागवत महापुराण मे नवनाथ जी की वर्णन मिलती है,ऋषभदेवजी के १०० पुत्र थे और १०० मे से ९ पुत्र ज्ञानमार्गी सन्यासी बन गये॰ इसी पुराण मे एकादश स्कन्ध मे इस बात की वर्णन बताई हुयी है॰
निमिराजा जी को ऋषियोने धर्म तत्व समजाई थी,वही ऋषि फिर से कलयुग मे जन्मे और उन्होने नाथसप्रदाय की स्थापना की और दुनिया की कल्याण की लिये ‘’योगसिद्धि’’ और भक्ति मार्ग समजाइ॰
कली ने ‘मच्छीन्द्र’, हरी ने ‘गोरक्ष’, अंतरिश ने ‘जालिन्दर’, प्रबुद्ध ने ‘कानिफ’, पिप्पलायन ने ‘चर्पटी’, अर्वीहोत्रा ने ‘वटसिद्ध नागनाथ’, द्रुमील ने ‘भर्तरी’,चमस ने ‘रेवण’ और करभजन ने ‘गहिनी’ इस प्रकार से इन्होंने जन्म ली है॰
आदिनाथ शिवजी और दत्तात्रेय जी की आज्ञा से,दीक्षा से नाथसप्रदाय की जन्म हुयी है॰
                                       
                                                           नाथपंथिय दीक्षा विधि

         नाथसप्रदाय मे दीक्षा ग्रहण करने की लिये पौष,माघ,फाल्गुन व चैत्र माह और पूर्णिमा शुभ मानी जाती है॰दीक्षा से पूर्व गुरु अपने शिष्य की अनेक प्रकार से परीक्षा तो लेते ही है॰ दीक्षा की समय सिहनाद सुनाई जाती है और ‘अलख निरंजन’ शब्द की महत्व समजाइ जाती है॰ दीक्षा की पद्धतीनुसार ‘दर्शनीनाथ व अवघडनाथ’ येसी दो प्रकार की सप्रदाय है॰ जीनके कान मे कुंडल होती है वह दर्शनीनाथ के नाम से जाने जाती है। साधना की माध्यम से भी आप नवनाथ सप्रदाय की अवघड दीक्षा की प्राप्ति कर सकते है॰
अब येसी विधि हमारे पास हो और हम दीक्षा प्राप्ति ना कर सके यह बात तो उचित ही नहीं है,इसीलिये आप भी अवघड दीक्षा की प्राप्ति कर सकते है ॰ अब यह दीक्षा आप प्राप्त करके साबर मंत्रो मे सफलता और पूर्ण गोरक्ष कृपा भी प्राप्त कीजिये॰

साधना सामग्री-
           
           काले कंबल की आसन,रुद्राक्ष माला,चैतन्य नवनाथ चित्र,

विधि-

            उत्तर या पूर्व दिशा की और मुख करके बैठीये,सामने किसी बाजोट पर पीली वस्त्र बिछानी है और इसपे चैतन्य सदगुरुजी एवं नवनाथ जी की चित्र की स्थापना कीजिये॰साथ मे कलश स्थापना भी करनी है,कलश स्थापना की विधि जैसी भी आपके पास हो उसी प्रकार से कीजिये॰ दीपक पूजन करके दीप प्रज्वलित करनी है और सुगंधित धूप बत्ती जलानी है॰ गुरुपूजन कीजिये और साथ मे गुरुमंत्र की ९ माला और ॐ नम: शिवाय मंत्र की १ माला करनी है ॰ सदगुरुजी से साधना सफलता की और दीक्षा प्राप्ति की लिये प्रार्थना कीजिये॰ ‘’श्रीनाथ जी की जय’’ बोलते हुये ताली बजानी है॰अब नवानाथ जी को प्रणाम करते हुये ९ बार नाथ मंत्र बोलनी है साथ मे ही अपनी मनोकामना बोलनी है की ‘’मै अमुक गुरुजी का शिष्य/शिष्या अवघडनाथ दीक्षा प्राप्ति एवं दर्शन की अभिलाषा हेतु आपसे प्रार्थना करता/करती हु,कृपया आप इस मनोकामना को पूर्ण कर दीजिये’’,और पुष्प माला चढ़ा दीजिये यह क्रिया ७ दिन नित्य करनी है॰





 गोरक्ष जालंदर चर्पटाच्श्र अड़बंग कानिफ मच्छीद्राद्या:। चौरंगीरेवणकभात्रीसंज्ञा भूम्यां बभूवर्ननाथसिद्धा:। ।




तान्त्रोक्त गोरखक्षनाथ प्रत्यक्षीकरण मंत्र-
                                 

                                   । । ॐ ह्रीं श्रीं गों हुं फट स्वाहा । ।                                    
                   



 साधना समाप्ती मे आखरी दिवस पर गोरखनाथ जी की दर्शन होती है और साथ मे ही उनसे सूष्म-पात,शक्तिपात या मंत्र दीक्षा की माध्यम से दीक्षा की प्राप्ति होती है॰ येसा अगर साधक के साथ संभव नहीं हुआ तो चिंता की कोई बात नहीं यह क्रिया उसके साथ स्वप्न की माध्यम से हो ही जाती है॰ माला को आप सदैव संभाल कर रखिये यह माला आपको साबर साधना ओ मे शीघ्र सफलता प्रदान करती है यह इस साधना की विशेषता है॰

अत्यंत तीव्र वशीकरण प्रयोग .

तंत्र की क्रिया में तो सैकड़ो सम्मोहन प्रयोग है पर यह प्रयोग अपने आप में अचूक और अत्यंत तीष्ण,तुरंत असर दिखने वाली प्रयोग है.बाकि प्रयोग असफल हो सकती है परन्तु इस प्रयोग की सफलता किसी चमत्कार से कम नहीं.
यह प्रयोग अघोरि और कपाली ओकी है.जिसे संपन्न करने से पाहिले १०० बार सोच समज़कर ही करनी चाहिए.
अमावस्या की रात्रि में बगीचा या फिर घरमे किसी कोने में बैट जाईये और अपने आसन की निचे श्मशान से लाकर थोड़ी सी राख राख दे आसन लाल रंग की होनी चाहिये फिर दक्षिण दिशा की और मुहकर सामने उस व्यक्ति की चित्र रख दे जिसे पूर्ण वशीकरण या सम्मोहित करनी/करना है.माला लाल हकिक की होनी चाहिये.
इसके बाद उस चित्र के सामने मात्र ५१ माला मन्त्र जाप करनी है और येसा करने से आश्चर्यजनक रूप से चमत्कार देखने को मिलती है और जो आपकी सर्वथा विरोधी व्यक्ति है वह भी आपके अनुकूल हो कर आपके कहे अनुसार कार्य संपन्न करती है.

                                                                       मंत्र

                      ||ॐ ऐम ऐम अमुक वाश्यमानय मम आज्ञा परिपालय ऐम ऐम फट ||

यह प्रयोग दिखने में अत्यंत सरल है परन्तु प्रभाव अचूक देखने मिलती है और तुरंत ही जिसे सम्मोहित करना चाहते है उसे अपने वश में करने में समर्थ हो जाते है.